• July 4, 2024

सियादेवी बालोद को रामगमन पथ में शामिल करने उठी मांग, मान्यता है कि माता सीता को ढूंढते हुए यहां पर भाई लक्षमण के साथ रुके थे भगवान राम

सियादेवी बालोद को रामगमन पथ में शामिल करने उठी मांग, मान्यता है कि माता सीता को ढूंढते हुए यहां पर भाई लक्षमण के साथ रुके थे भगवान राम

ट्राईसिटी एक्सप्रेस। न्यूज
भगवान राम के चरण अविभाजित दुर्ग जिले के बालोद स्थित सियादेवी नारागांव पर भी पड़े। गोस्वामी तुलसी दास के राम चरित मानस दर्शन में भी सिहावा और सियादेवी का प्रसंग है। स्थानी लोगों की मानें तो भगवान राम अपनी पत्नी माता सीता को ढूंढते हुए इस मार्ग से होकर गुजरे थे। उनके साथ उनके भाई लक्षमण साथ में थी। इसी जगह पर माता सती ने भगवान राम की परीक्षा ली थी, जिसमें माता सती माता सीता का वेश धर यहां पहुंची, लेकिन भगवान राम ने उन्हें पहचान लिया और माता कहकर संबोधन दिया। इसके बाद माता सती को अपनी गलतियों का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान शिव को इस पूरी घटना का वृतांत सुनाया। इसके बाद से इस जगह को पूजा जा रहा है। गोस्वामी तुलसी दास के राम चरित मानस में इसका जिक्र है। इसके बाद भी इस जगह को राम गमन पथ में शामिल नहीं किया है। इसके कारण स्थानी लोगों ने पुन: इस जगह पर राम गमन पथ में शामिल किए जाने की मांग उठाई है।
यहां के पूर्वज और कथा वाचकों द्वारा लगातार सिया देवी में भगवान राम के चरण पड़ने की बात कही जाती रही है। जैसा कि सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ भगवान राम का ननिहाल है। भगवान राम को जन्म देने वाली मां कौशिल्या अंबा का छत्तीसगढ़ मायका है। रिश्ते में प्रभु राम हम छत्तीसगढ़ प्रांतवासियों के भान्जे हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में भांचा राम कहा जाता है। भारतीय वांग्मय गोस्वामी तुलसी दास कृत राम चरित मानस दर्शन में आज से साढ़े 17 लाख वर्ष पूर्व त्रेतायुग में जन्में मानस के महानायक भगवान राम की लीला का संबंध छत्तीसगढ़ प्रांत के दण्डकारण्य के प्रारंभिक जिला बालोद भी अछूता नहीं है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रेतायुग माहि, संभु गये कुंभज ऋषि पाही। संग सती जगजननी भवानी, पुजे ऋषि अखिलेश्वर जानी। अर्थात एक बार त्रेतायुग में भगवान शिव कुम्भज अर्थात अगस्त ऋषि के पास कैलाश से चलकर मां सती को साथ लेकर आये। जिसे शिव आवा कहा गया कालान्तर में अपभ्रंश वाचन से सिव आवा आज सिहावा हो गया। कथा कहती है कि ऋषि सम्मान को प्राप्त कर भगवान शिव ध्यान मग्न होकर अगस्त ऋषि की कथा सुनते रहे, परन्तु माता सती का मन कथा और कथा वाचक दोनों में भी नहीं लगा। परिणाम यह हुआ कि दोनों वापस कैलाश पर्वत लौट रहे थे। दण्डकवन में भगवान राम सीता-सीता पुकारते, अन्वेषण करते विरही के रूप में मृग, पशु, पक्षी, लता आदि को पूछते जा रहे थे। नारागांव के समीप भगवान राम को लीला करते देख भगवान शिव ने कहा – जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।। जय सच्चिदानंद प्रभु कहने पर मां सती को संशय हो गया और सती कहने लगी – ब्रम्ह जे व्यापक बिरज अज, अकल अनीह अभेद। सो कि देह धरी होहि नर, जाहि न जात बेद।। ये अपनी धर्मपत्नी को खोजने वाले कैसे भगवान हो सकते हैं। जब भगवान शिव ने देखा कि सती संशय में उलझ गयी है। तब भगवान शिव ने कहा सती, जो तुम्हारे मन अति संदेहू, तौ किन जाहि परीछा देहु ।। ऐसा कहकर शिव जी सती को परीक्षा लेने भेजकर समीप के पहाड़ी नुमा पठार में बैठि बट छाही और जिस पठार में भोले बाबाजी बैठे वह भोला पठार कहलाया जो आज भी परेंगुड़ा (करहीभदर) में स्थित है। परीक्षा लेने माता सती ने नारागांव के पास जिस जगह राम चरित मानस के अनुसार धरी सीता कर देह।। अर्थात जिस स्थान पर सती ने सिया का देह धारण किया वह सिया देही कहलाया। इस प्रकार रामायण कालीन गाथा से संबद्ध हमारे बालोद जिले में दो मंदिर भोला ष्ठार परेंगुड़ा (करहीभदर) और सियादेही नारागांव से है। ये कथा सद्‌गुरु ब्रह्म लीन वेदान्त केशरी स्वामी, आत्मा राम कुम्भज द्वारा हमेशा सुनाई जाती रही।
बालोद जिला मुख्यालय से 15 किमी की दूरी पर है नारागांव
बालोद जिले के गुरुर ब्लॉक मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर नारागांव में स्थित सिया देवी मंदिर श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। मान्यता यह भी है कि माता सीता के चरण कमल के निशान भी इस जगह हैं। देवी की सवारी शेर रात में माता की रक्षा के लिए आता था। यह स्थान महर्षि वाल्मीकि के तपो भूमि के रूप में भी प्रसिद्ध है। प्राकृतिक जल प्रपात एवं गुफाओं से आच्छादित नारागांव आध्यत्मिक केंद्र और पर्यटन स्थल के लिए प्रसिद्ध है। यहां एक झरना भी है। झरने को वाल्मिकी झरने के नाम से जाना जाता है। नर्रा और नारागांव दोनों जगह देवी मंदिर हैं। इस जगह पर वाल्मीकि ऋषि की मूर्ति, शिव-पार्वती, गणेश, लव, कुश, सती माता की मूर्ति स्थापित है। इसके अलावा राम-सीता लक्ष्मण, हनुमान, राधा कृष्ण, सियादेवी, भगवान बुद्ध, बूढादेव का भी मंदिर है।
राम गमन पथ में सियादेवी को शामिल नहीं किया गया
राम वन गमन पथ छत्तीसगढ़ के उन जगहों से होकर गुजर रही है, जहां भगवान राम के पैर पड़े हैं। यह देश के कई जिलों से होकर गुजरा है। राम वन गमन पथ की लंबाई 2260 किमी है। छत्तीसगढ़ से राम वन गमन पथ का अधिकांश हिस्सा गुजर रहा है। इसमें कोरिया से लेकर सुकमा तक का हिस्सा है। 50 फीसदी के करीब छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पथ का काम पूरा हो गया है। छत्तीसगढ़ में भगवान राम का ननिहाल है। जहां से राम वन गमन पथ गुजर रही है। राम वन गमन पथ छत्तीसगढ़ में उन नौ स्थानों से भी गुजर रही है, जहां भगवान राम से जुड़ी यादे हैं। इन नौ स्थानों पर विकास काम किया जा रहा है। इनमें सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (अंबिकापुर), शिवरी नारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा-साऋषि आश्रम (धमतरी), जगदलपुर (बस्तर) और रामाराम (सुकमा) शामिल हैं। चंदखुरी रायपुर में माता कौशल्या मंदिर का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। वहीं शिवरीनारायण के साथ राजिम और तुरतुरिया में भी काम जारी है। छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पथ की लंबाई 528 किलोमीटर है।
राम वन गमन पथ पर पड़ने वाली जगहों की खासियत
जगदलपुर: यह बस्तर का जिला मुख्यालय है। यहां के बारे में कहा जाता है कि भगवान राम वनवास काल में यहां से गुजरे थे। जगदलपुर के जंगलों से चित्रकूट के लिए रास्ता जाता है। पांडुओं के अंतिम राजा काकतिया ने अपनी यहां राजधानी बनाई थी।

सिहावा: सिहावा छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में पड़ता है। यहां की पहाड़ियों पर अलग-अलग ऋषियों का आश्रम है। भगवान राम ने दंडकारण्य के आश्रण में वनवास के दौरान ऋषियों से भेंटकर कुछ समय गुजारे थे। सिहावा में शरभंग, अगस्त्य, अंगिरा, श्रृंगि, कंकर, मुचकुंद और गौतम ऋषि के आश्रम हैं।

राजिम: यह गरियाबंद जिले में पड़ता है। इसे गरियाबंद का प्रयाग कहते हैं। राजिम में सोंढुर, पैरी और महानदी का संगम है। वनवास के दौरान भगवान राम ने यहां अपने कुलदेवता महादेव की पूजा की थी। संगम पर कुलेश्वर महाराज का मंदिर है।

चंदखुरी:यह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में है। 126 तालाब वाले गांव के रूप में इसकी पहचान है। जलसेन तालाब के बीच में भगवान राम की मां कौशल्या माता का मंदिर है। दुनिया में एक मात्र यह जगह है, जहां माता कौशल्या का मंदिर है। कहा जाता है कि चंदखुरी में ही माता कौशल्या का जन्म हुआ है। इसलिए चंदखुरी को भगवान राम का ननिहाल कहा जाता है।

तुरतुरिया: यह बलौदबाजार भाटपारा में पड़ता है। यहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। कहा जाता है कि लव-कुश की जन्मस्थली तुरतुरिया है। बलभद्री नाले का पानी चट्टानों के बीच से निकलता है। इसमें तुरतुर की आवाज आती है, यही वजह है कि इस जगह का नाम तुरतुरिया है।

शिवरीनारायण: शिवरीनारायण जांजगीर चांपा जिले में पड़ता है। भगवान राम ने यहां रुककर शबरी के जूठे बेर खाए थे। शिवरीनारायण में ही जोक, शिवनाथ और महानदी का संगम है। इस जगह पर नर-नारायण और शबरी का मंदिर है। मंदिर के पास स्थित वट वृक्ष के पत्ते दोने के आकार के हैं।

रामगढ़ की पहाड़ी: यह सरगुजा जिले में पड़ता है। रामगढ़ की पहाड़ी पर तीन कक्षों वाली सीताबेंगरा गुफा है। वनवास के दौरान भगवान राम यहां पहुंचे थे। इसमें सीता का कमरा था।

75 जगहों पर होना है सौंदर्यीकरण का कार्य

दरअसल, छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पथ से जुड़े जगहों के साथ-साथ कुल 75 जगहों को चिह्नित किया गया है, जिसे नए पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जाएगा। ये सभी जगह भगवान राम के वनवास काल से संबंधित है। उन जगहों का भगवान राम से कोई न कोई नाता है। पहले चरण में नौ जगहों पर काम चल रहा है। इसमें उत्तरी छत्तीसगढ़ में कोरिया से लेकर दक्षिण में सुकमा तक शामिल है। सरकार की कोशिश है कि चुनाव से पहले कुछ जगहों को संवार दिया जाए।


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